
बिलासपुर :— प्रयागराज के पावन माघ कुम्भ क्षेत्र में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज एवं उनके शिष्यों के साथ पुलिस प्रशासन द्वारा किए गए दुर्व्यवहार का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। इस घटना ने न केवल धार्मिक जगत को झकझोर दिया है, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है।
राजनीतिक सरगर्मियां तेज
शंकराचार्य के अपमान को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। हालात को देखते हुए यह कयास लगाए जा रहे हैं कि यह मुद्दा आने वाले समय में एक बड़ा ‘विस्फोटक’ रूप अख्तियार कर सकता है।
अर्जुन तिवारी का कड़ा प्रहार
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रतिनिधि और लोकप्रिय नेता अर्जुन तिवारी ने इस घटना पर कड़ा रोष व्यक्त किया है। उन्होंने एक आधिकारिक विज्ञप्ति जारी कर इस कृत्य की घोर निंदा करते हुए कहा:—
“प्रयागराज संगम की पवित्र रेती पर शंकराचार्य जी के साथ जो कुछ भी हुआ, वह केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं है, बल्कि यह समस्त सनातन संस्कृति के मस्तक पर किया गया सीधा प्रहार है। ऐसी शर्मनाक घटना के लिए शब्द कम हैं, इसकी जितनी भर्त्सना की जाए वह कम ही होगी।”
इतिहास का हवाला
तिवारी ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए यह भी उल्लेख किया कि मल्लेछ काल से चली आ रही 300 साल की रोक के बाद जिस कुंभ को महान पेशवाओ ने बलिदानों के बाद पुनर्जीवित किया,उसी माघ कुंभ में सनातनियों के सबसे बड़े धर्मगुरु का अपमान एवं साधूओ को बाल पकड़ कर घसीटा जा रहा है और इस पूरे दृश्य में कोई मुसलमान या ईसाई नहीं है,हिंदू खतरे में है मगर किससे,? उन हिंदूत्ववादी ताकतों से जो अपने आप को भगवान राम से भी ऊपर मानते हैं, हनुमान जी को उड़ाने की ताकत रखते हैं!
मौनी अमावस्या, जो मौन, तप, करुणा और आत्मसंयम का प्रतीक है—उसी पावन तिथि पर प्रयागराज के संगम तट पर जो हुआ, वह केवल कुछ व्यक्तियों पर किया गया अत्याचार नहीं था, बल्कि सनातन संस्कृति के मस्तक पर किया गया प्रहार था,सिर्फ़ एक धर्म परायण संत को रोकने की घटना नहीं है,ये संवैधानिक और धार्मिक मर्यादाओं को रौंदने की तस्वीर है, धर्माचार्य शंकराचार्य महाराज स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद जी को पुलिस द्वारा रोकना और उनके समर्थकों के साथ धक्का-मुक्की – अशोभनीय व्यवहार सीधे-सीधे सत्ता के अहंकार का प्रदर्शन है,
उत्तर प्रदेश की पुलिस अब संविधान से नहीं, सत्ता से संचालित हो रही है,सवाल पूछने वालों को रोको,विरोध करने वालों को दबाओ,शिखा केवल केश नहीं होती’ वह ब्रह्मचर्य, विद्या, तप, संयम और परंपरा की जीवित पहचान होती है। शिखा पकड़कर किसी सन्यासी या शिष्य को घसीटना, वास्तव में उस विचार को रौंदना है, जो हजारों वर्षों से भारत की आत्मा को जीवित रखे हुए है,यह कृत्य केवल हिंसा नहीं, यह सुनियोजित सांस्कृतिक अपमान है!!सनातन को सहनशीलता की आड़ में बार-बार अपमान सहने के लिए मजबूर किया जा रहा है। यह मौन अब साधना नहीं, अपराध बनता जा रहा है,जब धर्म पर प्रहार होता है,तब चुप रहना अधर्म का समर्थन बन जाता है,समूचे सनातन चेतन समाज की आंतरिक वेदना है।