
दुर्ग निवासी राजेन्द्र कुमार यादव वर्ष 2000-2001 में कृषि एवं भूमि विकास बैंक बेमेतरा में शाखा प्रबंधक के पद पर पदस्थ थे। पदस्थापना के दौरान ग्राम एरमसाही नवागढ़ ब्लाक निवासी किसान धीरेन्द्र कुमार शुक्ला ने अपने पिता राजेन्द्र नारायण शुक्ला के नाम से बोरवेल खनन के लिए सरकारी योजना के तहत लोन लेने आवेदन दिया।
बिलासपुर // सरकारी योजना के तहत बोरवेल खनन के लिए लोन स्वीकृत करने के एवज रिश्वत लेने के दाग से 23 साल बाद अखिरकार मृत्यु के बाद बैंक प्रबंधक को छुटकारा मिला है। निचली अदालत के फैसले को हाई कोर्ट ने रद कर दिया है। निचली अदालत ने एक वर्ष कैद की सजा सुनाई थी। निचली अदालत के फैसले के खिलाफ बैंक प्रबंधक ने 2003 में हाई कोर्ट में अपील पेश की थी। अपील लंबित रहने के दौरान उसकी मौत हो गई। इसके बाद पत्नी व बेटों ने मुकदमा को आगे बढ़ाया। करीब 22 वर्ष बाद हाई कोर्ट ने बैंक प्रबंधक को रिश्वत लेने के आरोप से मुक्त करते हुए निचली अदालत के आदेश को खारिज कर दिया है।
दुर्ग निवासी राजेन्द्र कुमार यादव वर्ष 2000-2001 में कृषि एवं भूमि विकास बैंक बेमेतरा में शाखा प्रबंधक के पद पर पदस्थ थे। पदस्थापना के दौरान ग्राम एरमसाही नवागढ़ ब्लाक निवासी किसान धीरेन्द्र कुमार शुक्ला ने अपने पिता राजेन्द्र नारायण शुक्ला के नाम से बोरवेल खनन के लिए सरकारी योजना के तहत लोन लेने आवेदन दिया। शाखा प्रबंधक राजेन्द्र कुमार यादव ने प्रोसेस शुल्क 526 रूपये जमा करने के लिए कहा। किसान ने शाखा प्रबंधक द्वारा रिश्वत मांगे जाने की लोकायुक्त रायपुर में शिकायत की। शिकायत पर लोकायुक्त ने मई 2001 को शिकायतकर्ता को केमिकल लगे करेंसी लेकर बैंक प्रबंधक के पास भेज एवं इशारा मिलते हुए ट्रैप कर शाखा प्रबंधक को हिरासत में ले लिया। आवश्यक कार्रवाई के बाद उसके खिलाफ न्यायालय में चालान पेश किया गया। विशेष न्यायाधीश ने शाखा प्रबंधक को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा सात में छह माह कैद 500 रुपये अर्थदंड और धारा 13 (डी) एक में एक वर्ष कैद एवं 500 अर्थदंड की सजा से दंडित किया। शाखा प्रबंधक ने कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील पेश की। अपील लंबित रहने के दौरान अपीलकर्ता शाखा प्रबंधक की मौत हो गई। इसके बाद पत्नी उतम कुमारी यादव, पुत्र प्रशांत यादव व निशांत यादव ने मुकदमा को आगे बढ़ाया। 22 वर्ष बाद अगस्त में अपील पर हाई कोर्ट में अंतिम सुनवाई हुई। हाई कोर्ट ने मामले में पाया कि शिकायतकर्ता ने अपीलकर्ता को 526 रुपये प्रोसेस शुल्क दिया था। ट्रैप टीम ने उनके जेब से 100-100 के चार करेंसी नोट जब्त करने की बात कही गई। प्रतिपरीक्षण में यह बात सामने आई कि, अपीलकर्ता के जेब से टीम ने सात-आठ करेंसी नोट निकाला था। रिश्वत में दिए गए नोट के नंबर भी दर्ज नहीं हैं। वहीं अपीलकर्ता ने बचाव में कहा कि, शिकायतकर्ता ने प्रोसेस शुल्क दिया था, जिसकी उसे रसीद भी दी गई। मामले में उक्त रसीद भी प्रस्तुत किया गया था। हाई कोर्ट ने सुनवाई के बाद बैंक प्रबंधक को रिश्वत लेने के आरोप से मुक्त करते हुए निचली अदालत के निर्णय को खारिज कर दिया है।