क्रोध का त्याग कर बनें खुशियों का दर्पण: बीके गायत्री

बिलासपुर। टिकरापारा स्थित प्रभु दर्शन भवन में आयोजित विशेष नुमाशाम सामूहिक योग एवं मुरली मंथन कार्यक्रम में बीके गायत्री बहन ने परमात्मा के अव्यक्त महावाक्यों पर गहन आध्यात्मिक चिंतन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि भगवान ने अपने अवतरण पर अपने बच्चों से सबसे बड़ा उपहार क्रोध रूपी अक का फूल अर्पित करने का आह्वान किया है। बीके गायत्री ने कहा कि जब मनुष्य अपने भीतर के क्रोध, अहंकार और व्यर्थ संकल्पों को परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देता है, तब वह स्वयं खुशियों का दर्पण बन जाता है। ऐसे व्यक्तित्व के माध्यम से अन्य आत्माओं को भी ईश्वरीय अनुभूति होने लगती है। उन्होंने कहा कि पूरे कल्प में केवल यही वह दिव्य संगमयुग है, जब निराकार परमपिता शिव और उनकी संतान स्वरूप शालिग्राम आत्माएँ एक साथ अपना जन्मोत्सव मनाती हैं। बीके गायत्री ने कहा कि क्रोध का मूल कारण मन में उठने वाले व्यर्थ प्रश्न और विशेष रूप से क्यों शब्द की लंबी श्रृंखला है। उन्होंने पाँच ‘क’ कौन, कब, कहाँ, कैसे और क्यों — को त्यागकर जीवन में हाँ जी और कमाल के संस्कार अपनाने की प्रेरणा दी।


विशेष सेवाधारियों को संबोधित करते हुए उन्होंने हर परिस्थिति में एकरस स्थिति बनाए रखने पर बल दिया तथा जगदंबा सरस्वती मम्मा के जीवन को आदर्श बताते हुए फॉलो मदर का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि हर आज्ञा में सहज हाँ जी कहना ही श्रेष्ठता और नंबर वन बनने की पहचान है। कार्यक्रम के अंत में उपस्थित सभी भाई-बहनों ने सामूहिक योगाभ्यास कर विश्वशांति के लिए शक्तिशाली शांति प्रकंपन फैलाए।

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