एनटीपीसी सीपत परियोजना पर किसानों का फूटा गुस्सा, कहा- बाहर से देखकर लौट गए अधिकारी


बिलासपुर। एनटीपीसी सीपत परियोजना से प्रभावित क्षेत्र के किसान वर्षों से दलदल और जलभराव की समस्या से जूझ रहे हैं। किसानों का आरोप है कि हर साल मुआवजा पाने के लिए उन्हें बार-बार आवेदन करना पड़ता है, लेकिन इसके बावजूद समय पर उचित मुआवजा नहीं मिलता। इस बार भी करीब 30 किसानों के मुआवजे में कटौती किए जाने से ग्रामीणों में भारी नाराजगी है। किसानों ने आरोप लगाया कि एनटीपीसी के अधिकारियों के द्वारा राजस्व अधिकारियों को भ्रमित कर प्रभावित किसानों के दावों को कमजोर किया जाता है, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। लगातार विरोध और शिकायतों के बाद कलेक्टर संजय अग्रवाल के निर्देश पर एसडीएम शिव कंवर और तहसीलदार गरिमा ठाकुर ने प्रभावित क्षेत्र का निरीक्षण किया। हालांकि किसानों का आरोप है कि अधिकारियों ने खेतों के भीतर जाकर वास्तविक स्थिति देखने के बजाय बाहर से ही निरीक्षण कर औपचारिकता पूरी कर ली। किसानों का कहना है कि एनटीपीसी हर साल गर्मी के मौसम यानी मार्च-अप्रैल में सर्वे कराती है, जब खेत सूखे दिखाई देते हैं। जबकि वास्तविक समस्या जून-जुलाई में जलभराव और अक्टूबर-नवंबर में दलदल की होती है। उनका सवाल है कि यदि फसल पकने और कटाई के समय खेतों में पानी और दलदल बना रहता है, तो खेती और फसल कटाई कैसे संभव होगी? ग्रामीणों के अनुसार प्रभावित खेत पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं। खेतों की मेड़ तक पहचान में नहीं आती, जगह-जगह बड़े गड्ढे बन गए हैं और खरपतवार इतनी अधिक फैल चुकी है कि खेत जंगल जैसे नजर आने लगे हैं। कहीं अत्यधिक पानी भर जाता है तो कहीं जल निकासी नहीं होने से खेती लगभग असंभव हो गई है। एक किसान ने बताया कि खेत की जुताई के लिए बुलाया गया ट्रैक्टर दलदल में फंस गया। उसे निकालने के लिए तीन अन्य ट्रैक्टर बुलाने पड़े, जिससे करीब 5 हजार रुपये का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ा। इस दौरान भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रदेश महामंत्री चंद्रप्रकाश सूर्या और जनपद सदस्य प्रतिनिधि भास्कर पटेल ने राजस्व अधिकारियों से सभी प्रभावित खेतों का निष्पक्ष निरीक्षण कराने की मांग की। उन्होंने कहा कि खेतों की मेड़ दोबारा बनाई जाए, गड्ढों को समतल किया जाए, खरपतवार हटाई जाए और खेतों को पहले की तरह खेती योग्य बनाया जाए। यदि ऐसा संभव नहीं है तो प्रभावित किसानों का स्थायी मुआवजा तय किया जाए, ताकि उन्हें हर वर्ष मुआवजे के लिए भटकना न पड़े। निरीक्षण के दौरान एसडीएम और तहसीलदार ने किसानों को आश्वस्त किया कि प्रभावित खेतों को पुनः खेती योग्य बनाने का प्रयास किया जाएगा। यदि ऐसा संभव नहीं हुआ तो नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी। किसानों का आरोप है कि पहले भी मुआवजा वितरण के दौरान एनटीपीसी अधिकारियों के हस्तक्षेप से राजस्व विभाग द्वारा प्रभावित रकबे में बार-बार कटौती की गई, जिससे उन्हें लगातार नुकसान उठाना पड़ा। अब किसानों की निगाहें प्रशासन और एनटीपीसी पर टिकी हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्या वर्षों से चली आ रही इस समस्या का स्थायी समाधान निकलेगा या फिर किसान हर साल दलदल, मुआवजे और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बीच संघर्ष करने को मजबूर रहेंगे।

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