पहुना कार्यक्रम में विधायक अमर बोले-जो नहीं आता, उसे सीखना ही मेरी आदत और जुनून


बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के पूर्व कैबिनेट मंत्री और बिलासपुर के वरिष्ठ विधायक अमर अग्रवाल ने कहा कि पहली बार ध्वजारोहण करने का अवसर मिला तो उन्हें सलामी, परेड और प्रोटोकॉल की जानकारी नहीं थी। तब तत्कालीन एसपी बीएस मरावी और कलेक्टर विकासशील को बंगले बुलाकर पूरी प्रक्रिया समझी। सीखने में कभी संकोच नहीं हुआ, जो नहीं आता, उसे सीखना चाहिए और लगातार आगे बढऩा चाहिए। यही बात उनके जीवन की आदत और जुनून बन गई। रविवार को बिलासपुर प्रेस क्लब के कार्यक्रम हमर पहुना में पहुंचे अमर अग्रवाल ने अपने बचपन, परिवार, राजनीति में प्रवेश, मंत्री के रूप में काम करने के अनुभव और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर पत्रकारों से खुलकर संवाद किया। अमर अग्रवाल ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत का श्रेय अपने पिता स्व. लखीराम अग्रवाल को देते हुए कहा कि उनके पिता अविभाजित मध्यप्रदेश में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य रहे। उनका राजनीतिक जीवन आदर्श और सेवा भावना से प्रेरित था। उन्होंने कभी पीए तक नहीं रखा और पिता के कामकाज में साथ देते-देते अमर अग्रवाल का राजनीति से स्वाभाविक जुड़ाव होता गया। उन्होंने बताया कि पिता की वजह से बचपन में ही भाजपा के कई दिग्गज नेताओं का घर आना-जाना देखा। सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी, कुशाभाऊ ठाकरे और राजमाता सिंधिया जैसे नेताओं को करीब से देखने और सुनने का अवसर मिला। यही माहौल आगे चलकर उनके राजनीतिक संस्कारों की बुनियाद बना। 22 सितंबर 1963 को खरसिया में जन्मे अमर अग्रवाल की प्रारंभिक शिक्षा खरसिया में हुई। इसके बाद बिलासपुर में कक्षा 9वीं से 11वीं तक बायोलॉजी की पढ़ाई की। उनका सपना डॉक्टर बनने का था। रायपुर के साइंस कॉलेज से पढ़ाई शुरू की, बाद में दुर्ग कॉलेज पहुंचे और फिर बिलासपुर लौटकर सीएमडी कॉलेज से बीकॉम की पढ़ाई पूरी की।
जब उन्हें प्रदेश की राजनीति में जिम्मेदारी देने की बात हुई तो उन्होंने शुरुआत में इनकार कर दिया। इसके बाद वर्ष 1996 में उन्हें भारतीय जनता युवा मोर्चा का जिलाध्यक्ष बनाया गया। 1998 में बिलासपुर विधानसभा से पहली बार चुनाव मैदान में उतरे। वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना और 2003 में वे दोबारा बिलासपुर से विधायक निर्वाचित हुए। इसके बाद उन्हें मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई। उद्योग और वित्त विभाग की जिम्मेदारी मिलने के बाद जब पहली फाइल उनके सामने आई तो उन्हें प्रक्रिया की जानकारी नहीं थी। सचिव ने पूरी प्रक्रिया समझाई और फाइल का निपटारा हो गया। लेकिन यहीं से उन्होंने तय किया कि प्रशासनिक कामकाज को सिर्फ अधिकारियों की जानकारी पर नहीं छोड़ा जा सकता। इसके बाद उन्होंने रोज पढऩा शुरू किया।

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