
बिलासपुर। संस्कृत के संरक्षण और संवर्धन की चर्चा अब केवल भाषा बचाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि संस्कृत शिक्षा को आधुनिक शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और रोजगार से जोडऩे की ठोस पहल जरूरी है। संस्कृत विद्यालयों में पढऩे वाले विद्यार्थियों के भविष्य को लेकर भी प्रदेश में पर्याप्त अवसर विकसित करने की जरूरत है। ये बातें प्राच्य संस्कृत विद्यालय संघ छत्तीसगढ़ के वामी परमात्मानंद और पुष्पा दीक्षित ने कही।
स्वामी परमात्मानंद और पुष्पा दीक्षित ने बिलासपुर प्रेस क्लब में पत्रकारों से चर्चा के दौरान कहा कि संस्कृत बोर्ड में ऐसे अधिकारियों की आवश्यकता है, जो संस्कृत भाषा और उसकी शिक्षा व्यवस्था को गहराई से समझते हों। प्रदेश में संस्कृत की प्राचीन परंपरा को आगे बढ़ाने वाले अनेक संस्कृत विद्यालय संचालित हैं। इन संस्थानों को सरकार की ओर से पर्याप्त अनुदान मिलना चाहिए। केवल विद्यालयों के संचालन के लिए ही नहीं, बल्कि शिक्षकों और विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के लिए भी सहयोग की व्यवस्था जरूरी है। उन्होंने कहा कि संस्कृत को केवल अनिवार्य विषय बनाने से इसका उद्देश्य पूरा नहीं होगा। ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए, जिसमें विद्यार्थी स्वयं संस्कृत को अपने अध्ययन का हिस्सा बनाना चाहें। इससे भाषा के प्रति स्वाभाविक रुचि और समाज में इसकी स्वीकार्यता बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि सामान्य सरकारी स्कूलों और पारंपरिक संस्कृत विद्यालयों की समस्याएं अलग हैं, इसलिए दोनों के लिए एक जैसी नीति के बजाय उनकी जरूरतों के अनुरूप अलग दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।