
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की विलुप्त होती लोक परंपराओं और तीज-त्योहारों को नई पीढ़ी से जोडऩे के उद्देश्य से भोजली पर्व का आयोजन लगातार विस्तार ले रहा है। आयोजकों का कहना है कि भोजली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सामाजिक एकता, भाईचारे, प्रेम और आपसी संबंधों को मजबूत करने वाली परंपरा है। इसे जीवंत रखने और देशभर में इसकी पहचान बनाने के लिए वर्षों से प्रयास किया जा रहा है। अगुवाई जन कल्याण समिति बिलासपुर के संयोजक विष्णु यादव, दीपमाला गुप्ता, देवनारायण साहू, राजू यादव, राखी यादव, मनोरमा यादव, पप्पू ठाकुर ने प्रेस क्लब में पत्रकारों से चर्चा करते हुए कहा कि वर्तमान युवा पीढ़ी धीरे-धीरे अपनी पारंपरिक संस्कृति और पर्वों से दूर होती जा रही है। ऐसे में भोजली जैसे आयोजनों के माध्यम से उन्हें अपनी जड़ों से जोडऩे का प्रयास किया जा रहा है। भोजली पर्व में महिलाओं की टोलियां उत्साहपूर्वक शामिल होती हैं और आपस में मितान , गिआ तथा महाप्रसाद बांटने की परंपरा निभाती हैं। आयोजकों ने इसे छत्तीसगढ़ का पारंपरिक फ्रेंडशिप डे बताते हुए कहा कि इस पर्व में आपसी प्रेम, मित्रता और सामाजिक संबंधों को मजबूत करने की परंपरा रही है। आयोजकों के मुताबिक भोजली आयोजन का प्रचार-प्रसार पिछले कई वर्षों से व्यापक स्तर पर किया जा रहा है। इसके लिए गांवों की सूची तैयार कर ऑटो के माध्यम से प्रचार कराया जाता है। इसके बाद विभिन्न गांवों से महिलाओं की टोलियां भोजली लेकर आयोजन स्थल तक पहुंचती हैं। पत्रकारों से चर्चा के दौरान भोजली घाट के विकास का मुद्दा भी उठाया गया। आयोजकों ने कहा कि कई वर्षों से अरपा नदी किनारे भोजली के लिए स्थायी और व्यवस्थित घाट बनाए जाने की मांग की जा रही है। इस संबंध में स्थानीय नेताओं और जनप्रतिनिधियों के समक्ष भी बात रखी गई, लेकिन अब तक इस दिशा में अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो सकी है।